बस्तर नहीं, अब 'दंडकारण्य' कहिए! संत समाज और धर्म स्तंभ काउंसिल की ऐतिहासिक मांग
बस्तर नहीं, अब 'दंडकारण्य' कहिए! संत समाज और धर्म स्तंभ काउंसिल की ऐतिहासिक मांग
- छत्तीसगढ़ को उसके पौराणिक गौरव से जोड़ने का वक्त आ गया , मुख्यमंत्री को सौंपा गया विस्तृत मांग पत्र
रायपुर@ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा को फिर से जाग्रत करने की पहल तेज़ हो गई है। धर्म स्तंभ काउंसिल ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को एक विस्तृत मांग पत्र सौंपते हुए ऐतिहासिक कदम उठाया है—बस्तर संभाग का नाम बदलकर फिर से “दंडकारण्य” करने की माँग। यह माँग महज़ नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सनातन पहचान और आत्मिक पुनर्स्थापना का आह्वान है। धर्म स्तंभ काउंसिल के सभापति डॉ. सौरभ निर्वाणी ने कहा, “बस्तर वह भूमि है जहाँ भगवान श्रीराम ने वनवास काल में धर्म के बीज बोए। यह क्षेत्र हजारों वर्षों से ‘दंडकारण्य’ के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन अंग्रेजों के काल में इसे बस्तर कहा जाने लगा—एक कृत्रिम पहचान।”
रामायण से लेकर आज तक जीवंत है दंडकारण्य की स्मृति
वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण और रामचरितमानस में दंडकारण्य का विस्तार मिलता है। बस्तर की गोंड-मुरिया जनजातियाँ आज भी श्रीराम को “बड़ेराज” कहकर पूजती हैं। लोककथाओं और चित्रकला में उनके वनवास की छवि आज भी जीवित है। भारत सरकार ने भी 1947 में बंगाल विस्थापितों के पुनर्वास के लिए “दंडकारण्य विकास प्राधिकरण” (DDA) की स्थापना इसी नाम से की थी—यह नाम केवल धार्मिक नहीं, प्रशासनिक स्वीकृति भी रखता है।
संत समाज का समर्थन और अगली रणनीति
नर्मदा कुंड निर्वाणी अखाड़ा के महंत सुरेंद्र दास ने कहा, “दंडकारण्य सिर्फ वन क्षेत्र नहीं, धर्म-अधर्म संघर्ष की भूमि है। अब वक्त है कि हम नाम में छिपी आत्मा को फिर से पहचानें।” निर्मोही, दिगंबर, वैष्णव ब्राह्मण संघ सहित अनेक संत-समाज संगठनों ने इस पहल का समर्थन किया है। धर्म स्तंभ काउंसिल जल्द ही “दंडकारण्य पुनर्जागरण यात्रा”, जन-संवाद और हस्ताक्षर अभियान शुरू करेगा। विधानसभा में प्रस्ताव लाने के लिए विधायक प्रतिनिधिमंडल नेता प्रतिपक्ष और सांसदों से भेंट करेगा। डॉ. रवीन्द्र द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि यह “नाम परिवर्तन नहीं, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पुनर्रचना” का अभियान है।

