छत्तीसगढ़ सूचना आयोग पर गंभीर सवाल: बिना हस्ताक्षर के आदेश, RTI कार्यकर्ता को न्याय से वंचित.

छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग की कार्यशैली पर उठे सवाल। मनेंद्रगढ़ के RTI कार्यकर्ता अशोक श्रीवास्तव को बिना हस्ताक्षर वाला आदेश भेजा गया। आरोप—आयोग ने खुद अपने ही आदेश से किया किनारा।

Sep 19, 2025 - 17:58
 0
छत्तीसगढ़ सूचना आयोग पर गंभीर सवाल: बिना हस्ताक्षर के आदेश, RTI कार्यकर्ता को न्याय से वंचित.
यह समाचार सुनें
0:00
Powered by Aeternik

छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग इन दिनों गंभीर विवादों में है। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर क्षेत्र के RTI कार्यकर्ता अशोक श्रीवास्तव द्वारा वन विभाग से 2017 से 2022 तक की कैशबुक और बैंक स्टेटमेंट की जानकारी मांगी गई थी, जो उन्हें अब तक नहीं दी गई है।

शुरुआत में जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपील अधिकारी ने जानकारी देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला राज्य सूचना आयोग पहुँचा, जहाँ आयुक्त धावेंद्र जायसवाल ने साफ निर्देश दिए थे कि मांगी गई जानकारी दी जाए। बावजूद इसके, वनमंडल बैकुंठपुर ने सिर्फ परिक्षेत्रों की सूची भेज दी।

जब श्रीवास्तव ने आयोग में अवमानना की शिकायत दर्ज की, तो आयोग ने 24 फरवरी 2025 को एक नया आदेश पारित किया, जो 19 जुलाई को उन्हें मिला। हैरानी की बात यह रही कि आदेश में हस्ताक्षर नहीं थे, सिर्फ एक स्टाफ ऑफिसर का नाम था, जबकि आदेश में आयुक्त आलोक चंद्रवंशी का उल्लेख था।

श्रीवास्तव ने इस आदेश को कानूनी रूप से अमान्य बताते हुए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के 5 मार्च 2025 के फैसले (WP 29100/2023) का हवाला दिया, जिसमें बिना हस्ताक्षर वाले आदेशों को Void माना गया है।

उनका आरोप है कि आयोग ने न सिर्फ जन सूचना अधिकारी का पक्ष लिया, बल्कि गलत तर्कों के आधार पर आदेश पारित किया, जबकि प्रधान मुख्य वन संरक्षक रायपुर पहले ही सभी DFO को कैशबुक और अन्य दस्तावेज संधारित करने का निर्देश दे चुके थे।

उन्होंने आयोग में भ्रष्टाचार और आदेशों में हेरफेर का आरोप लगाते हुए कहा कि यह अकेला मामला नहीं है—आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की गंभीर कमी है।

अब उन्होंने यह पूरा मामला राज्यपाल और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय तक पहुँचाया है और मांग की है कि:

इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए
दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए
राज्यपाल के अधीन RTI निगरानी सेल का गठन किया जाए

श्रीवास्तव का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो RTI जैसे पारदर्शिता के कानून का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है और यह सिर्फ "कागज़ी अधिकार" बनकर रह जाएगा।