समाज सुधारक से सांसद , तीन बार मुख्यमंत्री और झारखंड की राजनीति के दिशोम गुरु
शिबू सोरेन: चिंगारी से मशाल बनने तक की प्रेरक कहानी
एजेंसी। झारखंड की राजनीति का पर्याय माने जाने वाले शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, त्याग और नेतृत्व की प्रेरक गाथा है। 11 जनवरी 1944 को हजारीबाग (अब रामगढ़) जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन बचपन में ही अन्याय का शिकार हुए। उनके पिता की हत्या महाजनों ने कर दी, जिसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और आदिवासियों को एकजुट करने का संकल्प लिया।
यहीं से उनकी समाज सुधारक की यात्रा शुरू हुई। उन्होंने महाजनों के खिलाफ धनकटनी आंदोलन चलाया, आदिवासियों को शिक्षा के लिए जागरूक किया और धीरे‑धीरे अलग झारखंड राज्य के लिए जनांदोलन खड़ा कर दिया। चिंगारी से मशाल बनकर उभरे शिबू सोरेन ने 1973 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की और आदिवासी समाज की आवाज़ बन गए।
राजनीतिक सफर और उपलब्धियाँ
1980 में पहली बार लोकसभा के लिए निर्वाचित
कुल 8 बार लोकसभा सदस्य और 2 बार राज्यसभा सदस्य बने
2 बार केंद्रीय मंत्री, जिनमें कोयला मंत्रालय और स्टील मंत्रालय का दायित्व संभाला
3 बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, हालांकि हर बार कार्यकाल अधूरा ही रहा
उनके जीवन में कई विवाद और चुनौतियाँ आईं। कभी उपचुनाव हारने के कारण, तो कभी कानूनी मुश्किलों की वजह से उन्हें पद छोड़ना पड़ा। फिर भी वे झारखंड की राजनीति के सबसे बड़े और सर्वमान्य नेता बने रहे।
झारखंड का सच्चा ‘दिशोम गुरु’
शिबू सोरेन का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने झारखंड को महाजनी प्रथा और सामाजिक दासता से आजादी दिलाई। उनके जीवन की कहानी हौसला, संघर्ष और समर्पण का प्रतीक है। आज झारखंड और पूरा आदिवासी समाज अपने मार्गदर्शक को खोकर शोकाकुल है, लेकिन उनकी लिखी गई संघर्ष और विकास की इबारत हमेशा आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाती रहेगी।
दिशोम गुरु की विरासत
शिबू सोरेन ने समाज सुधारक, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता के रूप में अलग झारखंड राज्य की नींव रखी। उन्होंने आदिवासी समाज को राजनीतिक पहचान दिलाई और झामुमो को एक मजबूत क्षेत्रीय दल के रूप में खड़ा किया। आज उनकी गाथा न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश के लिए संघर्ष और नेतृत्व की प्रेरणा है।
संघर्ष से जन्मा नेतृत्व
बचपन में ही सूदखोरों द्वारा पिता सोबरन माझी की हत्या ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। परिवार टूटा, लेकिन शिबू सोरेन ने हार नहीं मानी। उन्होंने लकड़ी बेचकर परिवार का गुजारा किया और धीरे‑धीरे आदिवासियों को संगठित कर महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। उनकी नगाड़े की आवाज पूरे झारखंड में संदेश बन जाती थी। इस संघर्ष ने उन्हें ‘गुरुजी’ बना दिया।

